Tag Archives: Mughal

ताजमहल – ये चमनज़ार यह जमुना का किनारा ये महल


ताज तेरे लिए इक मजहर-ऐ-उल्फत ही सही
तुझ को इस वादी-ऐ-रंगीन से अकीदत ही सही

मेर्री मेहबूब कहीं और मिला कर मुझ से

बज़्म-ऐ-शाही में ग़रीबों का गुज़र क्या मा’अनी
सब्त जिस राज पे हों सतवत-ऐ-शाही के निशाँ
उस पे उल्फत भरी रूहों का सफ़र क्या मा’अनी

मेरी महबूब पास-ऐ-पर्दा-ऐ-ताश-हीर-ऐ-वफ़ा
तू ने सतवत के निशानों को तो देखा होता
मुर्दा शाहों के मकाबिर से बहलने वाली
अपने तारीक मकानों को तो देखा होता

अनगिनत लोगों ने दुनिया में मुहब्बत की है
कौन कहता है की सादिक न थे जज्बे उन के
लेकिन उन के लिए ताश-हीर का सामान नहीं
क्यूँ के वो लोग भी अपनी ही तरह मुफलिस थे

ये इमारात-ओ-मकाबिर ये फ़सीलें,ये हिसार
मुतला-कुल्हुक्म शहंशाहों की अजमत के सुतून
दामन-ऐ-दहर पे उस रंग की गुलकारी है
जिस में सामिल है तेरे और मेरे अजदाद का खून

मेरी महबूब! उन्हें भी तो मुहब्बत होगी
जिनकी सन्ना-ई ने बख्शी है इसे शक्ल-जमील
उन के प्यारों के मकाबिर रहे बेनाम-ओ-नमूद
आज तक उन पे जल्ला-ई न किसी ने कंदील

ये चमनज़ार यह जमुना का किनारा ये महल
ये मुनक्क़श दर-ओ-दीवार, यह मेहराब ये ताक
इक शहंशाह ने दौलत का सहारा ले कर
हम ग़रीबों की मुहब्बत का उराया है मजाक

मेरी महबूब कहीं और मिला कर मुझ से!

–साहिर लुधियानवी(Sahir Ludhianvi 1921-1980)

Advertisements
Tagged , , , , , , , , , , , ,
%d bloggers like this: